Monday, 23 June 2025

उत्तराखंड में खुद और नरै

बहुत प्रिय व्यक्ति, वस्तु, स्थान, स्थिति या अंतरंग स्थितियों को याद करते हुए हमारे मनम जो विचित्र सी अनुभूति होती है उसके लिए उत्तराखंड में दो लोकप्रिय शब्द हैं — खुद लगण (गढ़वाली), नरै (कुमाउँनी)।
तुलसी और सूरदास ने ऐसी स्थितियों के लिए सुध शब्द का प्रयोग किया है—
" आज मुझे रघुवर की सुध आई..."
"जब ही सुध आवत वा ब्रज की 
मन उमगत तन नाहीं।
ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।"
गीता गैरौला ठीक ही कहती हैं, "वास्तव में तो ये शब्द नहीं, एहसास हैं बस।"

कुमाउँनी में "नरै/नराई" की व्युत्पत्ति मैं नहीं जान पाया। एक अटकल लगाता हूँ कि संभवत: इसका संबंध कुमाउँनी क्रियापद 'न रईंण' (न रहा जाना, व्यक्त न कर पाना) से हो सकता है। एक ऐसी स्थिति जिसे स्मरण किए बिना न रहा जा सके , बताया-समझाया न जा सके, वह है नरै।
"नरै" का गढ़वाली पर्याय है "खुद"। इन दोनों का हिंदी में ठीक समानार्थी मिला नहीं, अंग्रेजी में nostalgia के निकट माना जा सकता है | 'खुद' तो संस्कृत के 'क्षुधा' या 'क्षुब्ध' से विकसित लगता है।क्योंकि #गढवाली "खुद" में मिलने की एक भीतरी "क्षुधा" है और है न मिल पाने या न देख पाने से जन्मी "क्षुब्धता" भी! आप चाहें तो मेरी इस व्युत्पत्ति को घुणाक्षर न्याय कह सकते है!

देखिए किसको किसकी खुद/नरै लग सकती है—
पत्नी को पति की
पति को पत्नी की
संतान को माँ-पिता की
माँ-पिता को संतान की
भाई को बहन/भाई की
बहन को भाई/बहन की
मित्र को मित्र की
रिश्तेदार को रिश्तेदार की 
प्रेमी को प्रेमिका की
प्रेमिका को प्रेमी की
सास-बहू की खुद/नरै लोकसाहित्य में नहीं मिली, प्रयोग में है |
यहाँ तक तो ठीक, इसके अलंकारिक, लाक्षणिक प्रयोग गजब के हैं!
प्रवासी को पहाड़, गढ़वाल, कुमाऊँ, गाँव, खेत, "डाँडी-काँठी" तक की खुद लग सकती है! बहू को मायके के पेड़-पौधों, पशुओं की भी नरै लगती है। संतान को ईजा के हाथ के बने कापा-भात, रस, चुडकाणी, सया-सिङल की भी नरै/खुद लग सकती है।
✍️ सुरेश पंत