Wednesday, 9 July 2025

नकली माछ

पत्योड़, पत्यूड़ (नकली माछ)
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बीसियों नामों से जाना जाने वाला यह व्यंजन अरबी के पत्तों से बनता है और लगभग पूरे ही भारत में बड़े चाव से खाया जाता है। 
संस्कृत में इसे 'अलीकमत्स्य' (नकली माछ, झूठी मछली) कहा जाता था क्योंकि इसका स्वाद मछली के स्वाद-सा माना गया है। दूसरे शब्दों में शाकाहारियों का मत्स्याहार। यही अलीकमत्स्य बाद में बिगड़कर अलीकमच्छ, लीकमच्छ, रिकमच्छ, रिकवछ, गिरवच हो गया।
आयुर्वेदिक ग्रंथ राजनिर्घंट¹ के अनुसार पान के पत्तों से मास (उड़द) की पिट्ठी लपेटकर पहले अंगारों में स्वेदन (भाप) से पकाकर, टुकड़े करके तिल के तेल में तला जाना चाहिए। पान के पत्ते सब जगह सरलता से उपलब्ध नहीं होते, इसलिए विकल्प अरबी के पत्ते बन गए और अब वे ही अधिक प्रचलित हैं। व्यंजन की विधि सदियों से लगभग वही है।
 राजनिर्घंट के ही अनुसार इस नकली माछ की साइड-डिश है– बैगन का "भटित्र"; भटित्र को समझाया गया है –शूलपक्वमांसादि–
"लोहे की सींकों में पिरोकर बनाए जाने वाला मांस आदि।" सींकिया बैंगन कह सकते हैं।
जैसा कि प्रारंभ में कहा था, इस व्यंजन के अनेक नाम हैं। आप अपने क्षेत्र का नाम बताइए।
[¹माषपिष्टिकया लिङ्ग्यनागवल्लीदलैर्महत्।
तत्तु संस्वेदयेद्युक्त्या स्थाल्यामङ्गारकोपरि।
ततो निष्कासितं खण्ड्यं तिलतैलेन भर्ज्जयेत्॥
अलीकमत्स्य उक्तोऽयं प्रकारः पाकपण्डितैः॥
तं वृन्ताकभटित्रेण वास्तूकेन च भक्षयेत्॥]

Thursday, 3 July 2025

घर-बार

घर-बार क्या है? 
घर में बना हुआ मद्यपान कक्ष या मद्य संग्रहण प्रकोष्ठ (बार) नहीं है। घर-बार है रहने का स्थान, ठौर ठिकाना, घर और घर के सब काम-काज! जैसे: 
अपना घर-बार अच्छी तरह से देखो। 
घरबार धन-दौलत और घर की सुख सुविधाओं के लिए भी आता है, जैसे: 
वह घरबार छोड़कर साधु हो गया।
लाक्षणिक अर्थ में घर-परिवार का तात्पर्य पत्नी, बाल बच्चे और परिवार भी है; जैसे:
शादी हो गई, अब अपना घर-परिवार देखो।
घर-बार का "बार" संस्कृत द्वार अथवा वारक (रोकने वाला, रुकावट) से है, अर्थ है दरवाज़ा। बरोठा, बारजा इसी से हैं। विवाह में 'बार रुकाई' नाम से एक प्रथा है जिसमें वर-वधू को दरवाजे के पास रोककर कुछ कर्मकांड किया जाता है। बहन अपने भाई-भाभी को दरवाज़े पर रोक कर नेग माँगती है। 
वही 'बार' है घर-बार का। 

Monday, 23 June 2025

उत्तराखंड में खुद और नरै

बहुत प्रिय व्यक्ति, वस्तु, स्थान, स्थिति या अंतरंग स्थितियों को याद करते हुए हमारे मनम जो विचित्र सी अनुभूति होती है उसके लिए उत्तराखंड में दो लोकप्रिय शब्द हैं — खुद लगण (गढ़वाली), नरै (कुमाउँनी)।
तुलसी और सूरदास ने ऐसी स्थितियों के लिए सुध शब्द का प्रयोग किया है—
" आज मुझे रघुवर की सुध आई..."
"जब ही सुध आवत वा ब्रज की 
मन उमगत तन नाहीं।
ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।"
गीता गैरौला ठीक ही कहती हैं, "वास्तव में तो ये शब्द नहीं, एहसास हैं बस।"

कुमाउँनी में "नरै/नराई" की व्युत्पत्ति मैं नहीं जान पाया। एक अटकल लगाता हूँ कि संभवत: इसका संबंध कुमाउँनी क्रियापद 'न रईंण' (न रहा जाना, व्यक्त न कर पाना) से हो सकता है। एक ऐसी स्थिति जिसे स्मरण किए बिना न रहा जा सके , बताया-समझाया न जा सके, वह है नरै।
"नरै" का गढ़वाली पर्याय है "खुद"। इन दोनों का हिंदी में ठीक समानार्थी मिला नहीं, अंग्रेजी में nostalgia के निकट माना जा सकता है | 'खुद' तो संस्कृत के 'क्षुधा' या 'क्षुब्ध' से विकसित लगता है।क्योंकि #गढवाली "खुद" में मिलने की एक भीतरी "क्षुधा" है और है न मिल पाने या न देख पाने से जन्मी "क्षुब्धता" भी! आप चाहें तो मेरी इस व्युत्पत्ति को घुणाक्षर न्याय कह सकते है!

देखिए किसको किसकी खुद/नरै लग सकती है—
पत्नी को पति की
पति को पत्नी की
संतान को माँ-पिता की
माँ-पिता को संतान की
भाई को बहन/भाई की
बहन को भाई/बहन की
मित्र को मित्र की
रिश्तेदार को रिश्तेदार की 
प्रेमी को प्रेमिका की
प्रेमिका को प्रेमी की
सास-बहू की खुद/नरै लोकसाहित्य में नहीं मिली, प्रयोग में है |
यहाँ तक तो ठीक, इसके अलंकारिक, लाक्षणिक प्रयोग गजब के हैं!
प्रवासी को पहाड़, गढ़वाल, कुमाऊँ, गाँव, खेत, "डाँडी-काँठी" तक की खुद लग सकती है! बहू को मायके के पेड़-पौधों, पशुओं की भी नरै लगती है। संतान को ईजा के हाथ के बने कापा-भात, रस, चुडकाणी, सया-सिङल की भी नरै/खुद लग सकती है।
✍️ सुरेश पंत 


Saturday, 1 February 2025

बारहखड़ी

बारहखड़ी
व्यंजनों के साथ स्वरों  और अनुस्वार-विसर्ग के संयोग से बनने वाले अक्षरों के क्रम को बारहखड़ी कहते हैं। जब हम व्यंजनों को प्रत्येक स्वर के साथ मिलाकर किए जाने वाले उच्चारण को क्रम से सूचीबद्ध करते हैं तो एक सारणी बनती है, जिसे बारहखड़ी कहा जाता है।

बारहखड़ी (बाराखड़ी) में बारह तो 12 है, खड़ी क्या है?
खड़ी का संबंध खड़ी बोली या अक्षर की खड़ी की हुई आकृति से नहीं है। बारहखडी द्वादशाक्षरी [द्वादश (बारह) +अक्षर (आखर) ] से बना है। बारहाखरी > बारहखड़ी अर्थात् आखर (अक्षर) के 12 रूप! जैसे :-
क का कि की कु कू कृ के कै को कौ, कं क:।


कुछ लोग बारहखड़ी में ऋ को स्थान नहीं देते । उनका मानना है कि ऋ का उपयोग बहुत कम और थोड़े-से व्यंजनों के साथ होता है। और यह भी कि ऋ को भी स्वीकार कर लिया जाए तो बारहखड़ी तो तेरहखड़ी हो जाएगी!

यह ठीक नहीं है, क्योंकि पहला अक्षर तो मूल है। उस पर कोई मात्रा नहीं लगती। मात्रा संकेत जोड़े जाने पर उसके कुल 12 अक्षरी रूप (ऋ सहित) बनते हैं। ऋ को सम्मिलित न करें तो इग्याराखड़ी रह जाएगी।

(ं) तथा ( : ) स्वर नहीं हैं किंतु स्वरों के बिना बोले नहीं जा सकते तथा स्वरों के समान ही इनकी मात्राएँ होती हैं जो अक्षर का स्वतंत्र रूप बनाती हैं। इसलिए बाराखड़ी सारणी में इनको स्थान दिया जाता है।
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