Wednesday, 11 March 2026

बटि (से)—> जाणे (तक)


#कुमाउँनी में भी #नेपाली 'देखि' के समान ही अपादान कारक का कारक चिह्न "बटि"।
 नामिक क्रिया बाट (राह) > बटीण (राह चलना प्रारंभ करना, to proceed) से बना कृदंत बटि (=प्रारंभ करके/चलकर) है।
 
पूरक अव्यय 'तक' के लिए "जाण्" क्रिया से बना कृदंत "जाणे" (जाना=जाने/पहुँचने to reach)। 
जैसे:
~नौ बटि दस तक । (9 से 10 तक)
~उत्तर बटि दक्षिण तक । (उत्तर से दक्षिण तक)
'तक' अव्यय के बिना सामान्य अपादान में भी 'बटि' का प्रयोग होता है-
~रुख बटि आम टोड़। (पेड़ से आम तोड़ो)
~घर बटी भैर निकल। (घर से बाहर निकलो)।
कुछ अंचलों में बटि का 'बठे' या 'बै' हो जाता है।
बाट (राह) > बटीण नामिक क्रिया नहीं, नामधातु है। 
बाट (संज्ञा) —> बटीण (नामधातु)।

एक अन्य स्थिति में अपादान के लिए नेपाली में भी कुमाउँनी बाट > बटि की भाँति 'बाट' प्रत्यय है। जैसे 
~झ्याल्बाट पोखरी देखिन्छ।
(खिड़की से तालाब दिखाई देता है।)
"देखि... सम्म" वाली वाक्य रचना में देखि प्रत्यय देखिनु का कृदंत हो सकता है। 
~बैतड़ीदेखि काठमाण्डूसम्म। (बैतड़ी से काठमांडू तक)
~एकदेखि सयसम्म। (1 से 100 तक)
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#साधो_शब्दसाधना_कीजै


Wednesday, 9 July 2025

नकली माछ

पत्योड़, पत्यूड़ (नकली माछ)
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बीसियों नामों से जाना जाने वाला यह व्यंजन अरबी के पत्तों से बनता है और लगभग पूरे ही भारत में बड़े चाव से खाया जाता है। 
संस्कृत में इसे 'अलीकमत्स्य' (नकली माछ, झूठी मछली) कहा जाता था क्योंकि इसका स्वाद मछली के स्वाद-सा माना गया है। दूसरे शब्दों में शाकाहारियों का मत्स्याहार। यही अलीकमत्स्य बाद में बिगड़कर अलीकमच्छ, लीकमच्छ, रिकमच्छ, रिकवछ, गिरवच हो गया।
आयुर्वेदिक ग्रंथ राजनिर्घंट¹ के अनुसार पान के पत्तों से मास (उड़द) की पिट्ठी लपेटकर पहले अंगारों में स्वेदन (भाप) से पकाकर, टुकड़े करके तिल के तेल में तला जाना चाहिए। पान के पत्ते सब जगह सरलता से उपलब्ध नहीं होते, इसलिए विकल्प अरबी के पत्ते बन गए और अब वे ही अधिक प्रचलित हैं। व्यंजन की विधि सदियों से लगभग वही है।
 राजनिर्घंट के ही अनुसार इस नकली माछ की साइड-डिश है– बैगन का "भटित्र"; भटित्र को समझाया गया है –शूलपक्वमांसादि–
"लोहे की सींकों में पिरोकर बनाए जाने वाला मांस आदि।" सींकिया बैंगन कह सकते हैं।
जैसा कि प्रारंभ में कहा था, इस व्यंजन के अनेक नाम हैं। आप अपने क्षेत्र का नाम बताइए।
[¹माषपिष्टिकया लिङ्ग्यनागवल्लीदलैर्महत्।
तत्तु संस्वेदयेद्युक्त्या स्थाल्यामङ्गारकोपरि।
ततो निष्कासितं खण्ड्यं तिलतैलेन भर्ज्जयेत्॥
अलीकमत्स्य उक्तोऽयं प्रकारः पाकपण्डितैः॥
तं वृन्ताकभटित्रेण वास्तूकेन च भक्षयेत्॥]

Thursday, 3 July 2025

घर-बार

घर-बार क्या है? 
घर में बना हुआ मद्यपान कक्ष या मद्य संग्रहण प्रकोष्ठ (बार) नहीं है। घर-बार है रहने का स्थान, ठौर ठिकाना, घर और घर के सब काम-काज! जैसे: 
अपना घर-बार अच्छी तरह से देखो। 
घरबार धन-दौलत और घर की सुख सुविधाओं के लिए भी आता है, जैसे: 
वह घरबार छोड़कर साधु हो गया।
लाक्षणिक अर्थ में घर-परिवार का तात्पर्य पत्नी, बाल बच्चे और परिवार भी है; जैसे:
शादी हो गई, अब अपना घर-परिवार देखो।
घर-बार का "बार" संस्कृत द्वार अथवा वारक (रोकने वाला, रुकावट) से है, अर्थ है दरवाज़ा। बरोठा, बारजा इसी से हैं। विवाह में 'बार रुकाई' नाम से एक प्रथा है जिसमें वर-वधू को दरवाजे के पास रोककर कुछ कर्मकांड किया जाता है। बहन अपने भाई-भाभी को दरवाज़े पर रोक कर नेग माँगती है। 
वही 'बार' है घर-बार का। 

Monday, 23 June 2025

उत्तराखंड में खुद और नरै

बहुत प्रिय व्यक्ति, वस्तु, स्थान, स्थिति या अंतरंग स्थितियों को याद करते हुए हमारे मनम जो विचित्र सी अनुभूति होती है उसके लिए उत्तराखंड में दो लोकप्रिय शब्द हैं — खुद लगण (गढ़वाली), नरै (कुमाउँनी)।
तुलसी और सूरदास ने ऐसी स्थितियों के लिए सुध शब्द का प्रयोग किया है—
" आज मुझे रघुवर की सुध आई..."
"जब ही सुध आवत वा ब्रज की 
मन उमगत तन नाहीं।
ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।"
गीता गैरौला ठीक ही कहती हैं, "वास्तव में तो ये शब्द नहीं, एहसास हैं बस।"

कुमाउँनी में "नरै/नराई" की व्युत्पत्ति मैं नहीं जान पाया। एक अटकल लगाता हूँ कि संभवत: इसका संबंध कुमाउँनी क्रियापद 'न रईंण' (न रहा जाना, व्यक्त न कर पाना) से हो सकता है। एक ऐसी स्थिति जिसे स्मरण किए बिना न रहा जा सके , बताया-समझाया न जा सके, वह है नरै।
"नरै" का गढ़वाली पर्याय है "खुद"। इन दोनों का हिंदी में ठीक समानार्थी मिला नहीं, अंग्रेजी में nostalgia के निकट माना जा सकता है | 'खुद' तो संस्कृत के 'क्षुधा' या 'क्षुब्ध' से विकसित लगता है।क्योंकि #गढवाली "खुद" में मिलने की एक भीतरी "क्षुधा" है और है न मिल पाने या न देख पाने से जन्मी "क्षुब्धता" भी! आप चाहें तो मेरी इस व्युत्पत्ति को घुणाक्षर न्याय कह सकते है!

देखिए किसको किसकी खुद/नरै लग सकती है—
पत्नी को पति की
पति को पत्नी की
संतान को माँ-पिता की
माँ-पिता को संतान की
भाई को बहन/भाई की
बहन को भाई/बहन की
मित्र को मित्र की
रिश्तेदार को रिश्तेदार की 
प्रेमी को प्रेमिका की
प्रेमिका को प्रेमी की
सास-बहू की खुद/नरै लोकसाहित्य में नहीं मिली, प्रयोग में है |
यहाँ तक तो ठीक, इसके अलंकारिक, लाक्षणिक प्रयोग गजब के हैं!
प्रवासी को पहाड़, गढ़वाल, कुमाऊँ, गाँव, खेत, "डाँडी-काँठी" तक की खुद लग सकती है! बहू को मायके के पेड़-पौधों, पशुओं की भी नरै लगती है। संतान को ईजा के हाथ के बने कापा-भात, रस, चुडकाणी, सया-सिङल की भी नरै/खुद लग सकती है।
✍️ सुरेश पंत 


Saturday, 1 February 2025

बारहखड़ी

बारहखड़ी
व्यंजनों के साथ स्वरों  और अनुस्वार-विसर्ग के संयोग से बनने वाले अक्षरों के क्रम को बारहखड़ी कहते हैं। जब हम व्यंजनों को प्रत्येक स्वर के साथ मिलाकर किए जाने वाले उच्चारण को क्रम से सूचीबद्ध करते हैं तो एक सारणी बनती है, जिसे बारहखड़ी कहा जाता है।

बारहखड़ी (बाराखड़ी) में बारह तो 12 है, खड़ी क्या है?
खड़ी का संबंध खड़ी बोली या अक्षर की खड़ी की हुई आकृति से नहीं है। बारहखडी द्वादशाक्षरी [द्वादश (बारह) +अक्षर (आखर) ] से बना है। बारहाखरी > बारहखड़ी अर्थात् आखर (अक्षर) के 12 रूप! जैसे :-
क का कि की कु कू कृ के कै को कौ, कं क:।


कुछ लोग बारहखड़ी में ऋ को स्थान नहीं देते । उनका मानना है कि ऋ का उपयोग बहुत कम और थोड़े-से व्यंजनों के साथ होता है। और यह भी कि ऋ को भी स्वीकार कर लिया जाए तो बारहखड़ी तो तेरहखड़ी हो जाएगी!

यह ठीक नहीं है, क्योंकि पहला अक्षर तो मूल है। उस पर कोई मात्रा नहीं लगती। मात्रा संकेत जोड़े जाने पर उसके कुल 12 अक्षरी रूप (ऋ सहित) बनते हैं। ऋ को सम्मिलित न करें तो इग्याराखड़ी रह जाएगी।

(ं) तथा ( : ) स्वर नहीं हैं किंतु स्वरों के बिना बोले नहीं जा सकते तथा स्वरों के समान ही इनकी मात्राएँ होती हैं जो अक्षर का स्वतंत्र रूप बनाती हैं। इसलिए बाराखड़ी सारणी में इनको स्थान दिया जाता है।
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Tuesday, 10 December 2024

Patrol से पतरौल यानी फसकाट


वनविभाग में एक बहुत छोटा पद होता है वनरक्षक। भ्रामक नाम है क्योंकि जब वनों की नियति लाभार्थियों के लिए कटना-उजड़ना बन गई हो तो बेचारा वनरक्षक कैसे रक्षा कर लेगा। अंग्रेजों के समय में उत्तराखंड में वन संपत्ति बहुत हुआ करती थी जिसका दोहन अंग्रेजों ने किया। "स्थानीय लोगों से वनों की रक्षा" के लिए वनरक्षक नियुक्त किए जाते। 
[फोटो सौजन्य: विकी कॉमन्स]
वनरक्षक के दो नाम हुआ करते थे-  फॉरेस्ट गार्ड और फॉरेस्ट पेट्रॉल। पहाड़ में पेट्रॉल को "पतरौल" कहा जाने लगा। अंग्रेज सा'ब पुराने पेड़ कटवाकर कोयला बनवाते और पतरौल ग्रामीणों की  दराँती-कुल्हाड़ी छीनकर उन्हें दैनिक आवश्यकताओं के लिए घास-पात भी नहीं काटने देता था। 
पतरौल के लिए दूसरा प्रचलित नाम था "फसकाट" या "फौसकाट"। फॉरेस्ट गार्ड के फसकाट बनने की कहानी बड़ी रोचक है। गार्ड साब को निर्जन घने जंगलों में घूम-घूमकर रखवाली करनी होती। कभी-कभी तो कई दिनों तक किसी आदमजात से बात तक न हो पाती। इस मानसिक दबाव के चलते कभी कोई भूला-भटका राहगीर मिल जाए तो थोड़ी देर फसक (गप्प ) हो जाती। इससे गार्ड को भी चैन मिलता। समझदार ग्रामीण उसे अपनी फसक-बातों में उलझाकर अपने काम भर की घास, लकड़ियाँ काटकर ले आते। महिलाएँ अपनी मीठी बातों में उलझाने का काम अधिक निपुणता से कर लेतीं। तो फॉरेस्ट गार्ड के लिए कहीं-कहीं नया शब्द अस्तित्व में आया "फसकाट" (फसक+काट), अर्थात जो फसक मारने गपशप करने) के बाद वन के उत्पादों को काटने दे। फसक के लिए कहीं-कहीं फौस मारना भी है। जिसे बातों में उलझाकर वन से घास, लकड़ी आदि पाई जा सके वह कहलाया-  फसकाट या फौसकाट।

Wednesday, 4 December 2024

कुछ शब्द कलमकारी के


(बैठे ठाले शब्दार्थ संयोग की ओर ध्यान गया। माध्यम , प्रमाध्यम से जुड़े लोग कृपया अन्यथा न लें। सच्चे पत्रकारों के प्रति मेरे मन में सदा सम्मान रहा है। यहाँ पर चर्चित कुछ शब्दों के प्रकल्पित लाक्षणिक अर्थ, कितने सार्थक हैं, बताइएगा।) 
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समाचार - (सम्यक् आचरण) -> नए संवाद, घटनाक्रम की सच्ची जानकारी को सम्यक रूप से प्रस्तुत करना।
न्यूज़ -> north-east-south-west से खोज-बीन कर नई जानकारी प्रदान करना।
प्रेस (दबाना ) -> किसी वस्तु, विषय अथवा घटना को सायास दबाने वाला तंत्र, उपकरण।
मीडिया - (माध्यम, मध्यस्थ) बिचौलिये; पाठक, ग्राहक , सौदे आदि को पटाने में मध्यस्थता करने वाले।

एंकर है तो टेढ़ा ही होगा।
एंकर शब्द संस्कृत के अंक/अंग से है जिसका अर्थ है टेढ़ा, मुड़ा हुआ, कोण। मछली फाँसने का उपकरण ऐंगल है। नावों, जहाज़ों को टिकाए रखने के लिए भी एंगल को काम में लाया जाता है।अंगुली, अँगूठा में भी अंग है। नावों, पोतों को रोकने थामने के लिए जिस एंकर का प्रयोग होता है वह भी कोणीय होता है। रेडियो टेलीविजन के एंकर भी यही काम करते हैं।
काँटे जैसे टेढ़ेपन से लोगों को फँसाने, बाँधने, टिकाए रखने का काम सबके बस का नहीं है, अपने टेढ़ेपन से एंकर ही यह कर सकते हैं। रेडियो/टीवी के प्रस्तोता सब एंकर हैं- काँटेदार।
इंग्लैंड का नाम भी इसीलिए इंग्लैंड पड़ा है! देखा कि भूखंड मछली के काँटे की तरह टेढ़ा है तो नाम हो गया एंग्लैंड > इंग्लैंड।
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कोई भला-बुरा संवाद जब तक 'समाचार' था तो 'सम्यक् आचरण' का नियम पालन करता था और सच बताता था। फिर 'प्रेस' कहलाया तो उसमें सच को 'दबाने' का गुण आ गया। अब 'मीडिया' है, जिसका मूल अर्थ है विज्ञापन के 'बिचौलिये'।
हिंदी का पत्रकार शब्द मौलिक है और लाजवाब भी। समस्या यह है कि अब मंडी पत्रकारों को लोग पत्तलकार कहने लगे।
(न्यूज़, प्रेस और माध्यम की परिभाषा Etymonlie के आधार पर। फ़ोटो सौजन्य: Wikicommons)
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