पत्योड़, पत्यूड़ (नकली माछ)
••••••
बीसियों नामों से जाना जाने वाला यह व्यंजन अरबी के पत्तों से बनता है और लगभग पूरे ही भारत में बड़े चाव से खाया जाता है।
संस्कृत में इसे 'अलीकमत्स्य' (नकली माछ, झूठी मछली) कहा जाता था क्योंकि इसका स्वाद मछली के स्वाद-सा माना गया है। दूसरे शब्दों में शाकाहारियों का मत्स्याहार। यही अलीकमत्स्य बाद में बिगड़कर अलीकमच्छ, लीकमच्छ, रिकमच्छ, रिकवछ, गिरवच हो गया।
आयुर्वेदिक ग्रंथ राजनिर्घंट¹ के अनुसार पान के पत्तों से मास (उड़द) की पिट्ठी लपेटकर पहले अंगारों में स्वेदन (भाप) से पकाकर, टुकड़े करके तिल के तेल में तला जाना चाहिए। पान के पत्ते सब जगह सरलता से उपलब्ध नहीं होते, इसलिए विकल्प अरबी के पत्ते बन गए और अब वे ही अधिक प्रचलित हैं। व्यंजन की विधि सदियों से लगभग वही है।
राजनिर्घंट के ही अनुसार इस नकली माछ की साइड-डिश है– बैगन का "भटित्र"; भटित्र को समझाया गया है –शूलपक्वमांसादि–
"लोहे की सींकों में पिरोकर बनाए जाने वाला मांस आदि।" सींकिया बैंगन कह सकते हैं।
जैसा कि प्रारंभ में कहा था, इस व्यंजन के अनेक नाम हैं। आप अपने क्षेत्र का नाम बताइए।
[¹माषपिष्टिकया लिङ्ग्यनागवल्लीदलैर्महत्।
तत्तु संस्वेदयेद्युक्त्या स्थाल्यामङ्गारकोपरि।
ततो निष्कासितं खण्ड्यं तिलतैलेन भर्ज्जयेत्॥
अलीकमत्स्य उक्तोऽयं प्रकारः पाकपण्डितैः॥
तं वृन्ताकभटित्रेण वास्तूकेन च भक्षयेत्॥]
No comments:
Post a Comment